April 5, 2018

बातचीत करने का कौशल कैसे बढाए - Personality Development


परिचय
क्या आप दूसरों के साथ आसानी से बातचीत शुरू कर पाते हैं? ऐसे कई लोग हैं, जिन्हें दूसरों से खासकर अजनबियों से बात करने के खयाल से ही पसीने छूटने लगते हैं। शर्मीलापन, इसकी एक वजह हो सकती है। उनके मन में ऐसे-ऐसे सवाल उठ सकते हैं: ‘आखिर मैं क्या बात करूँ? कहाँ से शुरू करूँ? बातचीत जारी कैसे रखूँ?’ दूसरी तरफ, आत्म-विश्वासी और मिलनसार लोग दूसरों से बात करने में ज़रा भी नहीं कतराते, और-तो-और वे शायद ही किसी और को बोलने का मौका देते हैं। उनके सामने यह मुश्किल हो सकती है कि दूसरों को भी अपनी राय ज़ाहिर करने का मौका दें और जो कहा जा रहा है, उसे सुनें। इसलिए, हम चाहे शर्मीले हों या मिलनसार, हममें से हरेक को बातचीत करने के कौशल को हमेशा बढ़ाते रहने की ज़रूरत है।

घर से शुरूआत कीजिए
क्यों न आप अपनी बातचीत करने का कौशल बढ़ाने की शुरूआत अपने घर से करें? घर के लोगों से हौसला बढ़ानेवाली बातचीत करने से काफी हद तक परिवार में खुशहाली बढ़ती है।

ऐसी बातचीत करने के लिए सबसे ज़रूरी है, एक-दूसरे के लिए सच्ची परवाह दिखाना। जिसकी हम परवाह करते हैं, उससे हम बात करते हैं और जब वह कुछ कहना चाहता है, तो हम ध्यान से उसकी सुनते हैं। इसके अलावा, एक और ज़रूरी बात है कि हम ऐसे विषयों पर कुछ कहें जिससे सुननेवाले को फायदा हो। अगर हम नियमित रूप से बाइबल पढ़ते और उसका अध्ययन करते हैं, तो बात करने के लिए हमारे पास विषयों की कोई कमी नहीं होगी। रोज़ाना बाइबल वचनों पर ध्यान दीजिए पुस्तिका का अच्छी तरह इस्तेमाल करके भी हम बातचीत शुरू कर सकते हैं। हमें शायद उस दिन, घर-घर के प्रचार काम में कोई अच्छा अनुभव मिला हो। या हमने किसी किताब में कोई मज़ेदार या नयी बात पढ़ी हो। हमें अपने परिवार के साथ इस तरह के अच्छे-अच्छे विषयों पर चर्चा करने की आदत बनानी चाहिए। तब हमें परिवार के बाहर दूसरों से बात करने में भी आसानी होगी।

अजनबियों से बात करना
बहुत-से लोग अजनबियों से बातचीत शुरू करने में झिझकते हैं। लेकिन यहोवा के साक्षी, परमेश्वर यहोवा और अपने पड़ोसी के प्यार की खातिर, बातचीत करने का हुनर सीखते हैं, क्योंकि वे दूसरों को बाइबल की सच्चाई सिखाना चाहते हैं। अजनबियों से बातचीत करने में सुधार करने के लिए कौन-सी बात आपकी मदद करेगी?

इसमें फिलिप्पियों में दिया सिद्धांत, बहुत अहमियत रखता है। इस आयत में हमें बताया गया है कि हम “अपनी ही हित की नहीं, बरन दूसरों की हित की भी चिन्ता करें। अब ज़रा सोचिए... इससे पहले आप उस इंसान से कभी नहीं मिले, इसलिए आप उसके लिए एक अजनबी हैं और आपको देखकर उसके मन में कई सवाल, कई शंकाएँ उठ रही होंगी। आप उसकी घबराहट कैसे कम कर सकते हैं? अच्छी तरह मुस्कराइए और दोस्ताना अंदाज़ में दुआ-सलाम कीजिए। लेकिन इसके अलावा, और बातों पर भी ध्यान देना ज़रूरी है।

हो सकता है कि वह कुछ सोच रहा हो और आपके बात करने से उसके विचारों में रुकावट आ गयी हो। अगर आप उसके विचारों का लिहाज़ न करते हुए, उसका ध्यान बस अपने विचारों की तरफ लाने की कोशिश करें, तो क्या वह आपका संदेश सुनने के लिए तैयार होगा? जब यीशु, सामरिया में एक कुएँ के पास एक स्त्री से मिला, तो उसने क्या किया? वह स्त्री पानी भरने के बारे में सोच रही थी। इसलिए यीशु ने उससे पानी के बारे में ही बातचीत शुरू की और कुछ ही समय बाद उनके बीच आध्यात्मिक बातों को लेकर एक दिलचस्प चर्चा हुई।

अगर आप अपने आँख-कान खुले रखेंगे, तो आपको भी अंदाज़ा होगा कि सामनेवाला किस बारे में सोच रहा है। क्या वह खुश नज़र आ रहा है या उदास है? क्या वह बुज़ुर्ग और शायद उम्र ढलने की वजह से कमज़ोर है? क्या उसके घर की चीज़ों से जान पड़ता है कि घर में बच्चे हैं? क्या वह अमीर है, या क्या घर का गुज़ारा करने के लिए उसे दिन-रात मेहनत-मशक्कत करनी पड़ती है? क्या उसके घर की सजावट या उसके गहनों से मालूम पड़ता है कि वह किसी धर्म पर आस्था रखनेवाला है? अगर आप इन सारी बातों को मन में रखते हुए, उससे दुआ-सलाम करेंगे, तो उसे यह महसूस हो सकता है कि आपकी और उसकी दिलचस्पी मिलती-जुलती है।

अगर आप किसी घर पर जाते हैं, और घर-मालिक दरवाज़ा नहीं खोलता बल्कि अंदर से ही बात करता है, तो इससे क्या पता चलता है? यही कि उसे अपनी हिफाज़त की चिंता है। तो क्या आप इसी विषय पर बातचीत शुरू कर सकते हैं?

कुछ जगहों में अगर आप अपने बारे में कुछ बताएँ, तो आप लोगों को बातचीत में शामिल करने में कामयाब हो सकते हैं। जैसे कि आप कहाँ से हैं, उनके घर क्यों आए हैं, आप परमेश्वर को क्यों मानते हैं, आपने बाइबल का अध्ययन करना क्यों शुरू किया और बाइबल में लिखी बातों से आपको कैसे मदद मिली। मगर हाँ, यह सारी जानकारी सोच-समझकर और सही मकसद से देनी चाहिए। खुद के बारे में बताने से सामनेवाला शख्स भी अपने बारे में कुछ बताना चाहेगा और अपनी राय ज़ाहिर करेगा।

कुछ संस्कृतियों में घर पर आए मेहमानों की खातिरदारी करने का दस्तूर होता है। ऐसी जगहों पर लोग खुशी-खुशी आपको घर के अंदर आकर बैठने के लिए कह सकते हैं। जब आप बैठ जाते हैं, तो अदब के साथ घर के लोगों की खैरियत पूछिए और ध्यान से उनका जवाब सुनिए। ऐसा करने से वे भी आपकी बात ध्यान देकर सुनेंगे। कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो मेहमानों में ज़्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं। इसलिए बाइबल का संदेश सुनाने से पहले, आपको शायद जान-पहचान बढ़ाने में ज़्यादा वक्‍त बिताना पड़े। इस दौरान हो सकता है, वे पाएँ कि उनकी और आपकी दिलचस्पी काफी मिलती-जुलती है। इससे आध्यात्मिक चर्चा करने का रास्ता खुल सकता है और इसके अच्छे नतीजे निकल सकते हैं।

अगर आपके इलाके में ऐसे बहुत-से लोग हैं जिनकी भाषा आप नहीं जानते हैं, तब आप क्या कर सकते हैं? आप ऐसे लोगों तक अपना संदेश कैसे पहुँचा सकते हैं? अगर आप उनकी भाषा में दुआ-सलाम के कुछ आसान से लफ्ज़ सीखकर उनका इस्तेमाल करें, तो उन्हें एहसास होगा कि आपको उनमें दिलचस्पी है। इससे आगे की बातचीत के लिए रास्ता खुल सकता है।

बातचीत कैसे जारी रखें?
बातचीत आगे बढ़ाने के लिए, दूसरे क्या सोचते हैं इसमें दिलचस्पी दिखाइए। अगर वह बात करना चाहता है, तो उसे खुलकर अपनी बात कहने के लिए उकसाइए। इसके लिए सोच-समझकर सवाल पूछिए, खासकर ऐसे सवाल जिनका जवाब देते वक्‍त वह अपनी राय ज़ाहिर कर सके। आम तौर पर ऐसे सवालों के जवाब सिर्फ हाँ या ना में नहीं दिए जा सकते। उदाहरण के लिए, अपने इलाके की किसी समस्या का ज़िक्र करने के बाद, आप पूछ सकते हैं... 'आपकी राय में इस समस्या की जड़ क्या है?'  या 'आपके ख्याल में इस समस्या का कोई हल है?'

जब सामनेवाला आपके सवाल का जवाब देता है, तो उसे ध्यान से सुनिए। एक-दो शब्द कहकर, सिर हिलाकर या कोई और इशारा करके ज़ाहिर कीजिए कि आप सचमुच उसकी राय जानना चाहते हैं। उसकी बात बीच में मत काटिए। वह जो कुछ बताता है, उस पर खुले दिमाग से विचार कीजिए। 'सुनने के लिये तत्पर और बोलने में धीरा होइए।' और जब आप बोलना शुरू करते हैं, तो अपनी बातों से दिखाइए कि आपने उसकी बात सचमुच कान लगाकर सुनी है।

लेकिन एक बात याद रखिए कि हर कोई आपके सवालों का जवाब नहीं देगा। कुछ लोगों से सवाल पूछने पर वे सिर्फ भवें तान लेते हैं या दूसरे मुस्कुरा देते हैं। कुछ बस हाँ या ना में जवाब देते हैं। ऐसे में आप बेचैन मत होइए, ना ही चर्चा में शरीक होने के लिए उन पर दबाव डालिए। इसके बजाय, धीरज से काम लीजिए। अगर एक इंसान सुनने को तैयार है, तो मौके का फायदा उठाकर उसे बाइबल से अच्छे-अच्छे विचार बताइए। कुछ समय बाद शायद वह आपको अपना दोस्त मानने लगे और अपने विचार खुलकर बताए।

जब आप लोगों से बात करते हैं, तो उनसे दोबारा मिलने की बुनियाद डालकर जाइए। अगर एक जन बहुत सारे सवाल पूछता है, तो कुछ सवालों के जवाब दीजिए और एक-दो सवालों की चर्चा अगली मुलाकात के लिए छोड़ दीजिए। उससे कहिए कि आप उन सवालों पर खोजबीन करेंगे और फिर उसे जवाब बताएँगे। लेकिन अगर वह कोई सवाल नहीं पूछता, तो आप खुद चर्चा के आखिर में एक ऐसा सवाल उठा सकते हैं, जिसका जवाब जानने में उसे दिलचस्पी हो सकती है। और अगली बार उससे मिलकर उस पर चर्चा करने की पेशकश कीजिए। इसके लिए आप रीज़निंग फ्रॉम द स्क्रिप्चर्स् किताब, परमेश्वर हमसे क्या माँग करता है ब्रोशर और हाल की प्रहरीदुर्ग और सजग होइए! पत्रिकाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिनमें बहुत-से दिलचस्प विषयों पर जानकारी दी गयी है।

अपने संगी विश्वासियों के साथ बातचीत
जब आप दूसरे साक्षियों से पहली बार मिलते हैं, तो क्या उनसे जान-पहचान बढ़ाने के लिए पहल करते हैं? या फिर आप चुपचाप, एक ही जगह पर खड़े रहते हैं? अपने भाई-बहनों के लिए प्यार हमें उकसाएगा कि हम उनसे जान-पहचान बढ़ाएँ। लेकिन आप बातचीत की शुरूआत कैसे कर सकते हैं? एक आसान-सा तरीका है, अपना नाम बताना और दूसरे भाई या बहन से उसका नाम पूछना। अकसर यह सवाल पूछना कि उसने सच्चाई कैसे सीखी, काफी होता है और देखते-ही-देखते आपके बीच एक दिलचस्प बातचीत शुरू हो जाएगी। और इससे आप एक-दूसरे को अच्छी तरह जान पाएँगे। अगर आपको लगता है कि आप सही तरह से बोल नहीं पा रहे हैं, तब भी बात करने की कोशिश से सामनेवाले भाई या बहन को यह लगेगा कि आपको उसकी परवाह है। उसे यह एहसास दिलाना ही सबसे बड़ी बात है।

अपनी कलीसिया के किसी सदस्य के साथ अच्छी बातचीत करने के लिए क्या ज़रूरी है? उसमें और उसके परिवार के लोगों में सच्ची दिलचस्पी दिखाइए। क्या सभा अभी-अभी खत्म हुई है? तो क्यों न आप उन विचारों पर बात करें जिससे आपको मदद मिली। इससे आप दोनों को फायदा होगा। साथ ही, आप हाल की प्रहरीदुर्ग या सजग होइए! पत्रिका में से किसी दिलचस्प मुद्दे का ज़िक्र कर सकते हैं। मगर याद रहे कि ऐसा, शेखी मारने या दूसरों के ज्ञान का इम्तहान लेने के इरादे से नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय, इस बातचीत से ऐसी जानकारी बाँटने की कोशिश कीजिए जो आपको खासकर अच्छी लगी। अगर आपको या सामनेवाले भाई या बहन को परमेश्वर की सेवा स्कूल में विद्यार्थी-भाग पेश करना है, तो आप दोनों मिलकर उस भाग को पेश करने के बारे में एक-दूसरे को सुझाव दे सकते हैं। इसके अलावा, आप प्रचार में मिले अनुभव भी बता सकते हैं।

लोगों में दिलचस्पी होने की वजह से हम अकसर उनके बारे में बात करते हैं, जैसे उन्होंने क्या कहा और क्या किया। कभी-कभी हम हँसी-मज़ाक की बातें भी करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी बातों से दूसरों का हौसला बढ़ता है? अगर हम परमेश्वर के वचन की सलाह को दिल से मानेंगे और परमेश्वर के प्यार से प्रेरित होंगे, तो हमारी बातचीत से दूसरों का हौसला ज़रूर बढ़ेगा।

जिस तरह प्रचार काम में जाने से पहले हम उसकी तैयारी करते हैं, उसी तरह अपने दोस्तों से बातचीत करने के लिए भी क्यों न कोई छोटी-मोटी दिलचस्प बात सोचकर रखें? जब आप कोई दिलचस्प बात पढ़ते या सुनते हैं, तो उसे नोट कर लीजिए ताकि बाद में दूसरों को यह बता सकें। कुछ समय बाद आपके पास बातचीत के लिए ढेरों विषय होंगे। इस तरह आप रोज़मर्रा की बातों के अलावा दूसरे कई विषयों पर बात कर सकेंगे। सबसे बढ़कर, आपकी बातचीत से यही साबित होना चाहिए कि परमेश्वर का वचन आपके लिए वाकई अनमोल है

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